उत्तराखंडी ई-पत्रिका की गतिविधियाँ ई-मेल पर

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

Wednesday, December 13, 2017

वोटुं बान गधों तैं बाप बुले जान्द त जनेऊ पैरणम क्यांक शरम?

चबोड़, चखन्यौ, झीस : भीष्म कुकरेती
-
 ब्याळी पुराणी धुराणी, कबसलिं पार्टी का नव निर्वाचित अध्यक्ष अर नया नया नखरों का साथ जनेऊ धारी लाटो गळ्या से मुलाक़ात ह्वे गे .
मि – क्या रै लाटु गळ्या आज गौळ बुकणो जगा जंद्यौ छै बुकणु?
लाटो गळ्या  - हाँ अमेरिकी कन्सल्टेंटन सल्ला दे बल हमेशा गर्रू गौळ नि बुकण चयेंद कबि कबि लोगु तै उल्लू बणानो बान हळको भार बि उठाण चएंद .
मि – भलो भलो . पर हे मूढ़ मनिख  ! त्वै  तै तमीज कनकै आई बल जंद्यौ हळको भार हूंद .
लाटो गळ्या  - मि तै थुका सूझ कि जंद्यौ बि पैरे सक्यांद . ऊ त सुशील शिंदे अंकलन सुझौ दे बल भौत ह्वे गे बल हिन्दू आतंकवाद्यूं छ्वीं . अब जरा मुसलमानों तै छोडिक जरा हिन्दुओं तै मूर्ख बणाये जावो .
मि – हाँ सब्युं तै क्या तेरी ब्वे तैं बि पता च बल त्वेम त रति भरक बि अक्कल नी च . ये भारतीय  प्रजातंत्र का फोड़ा  ! इन त बथादी कि जंद्यो मा कथगा लड़ी छन ? 
लाटो गळ्या  - लड़ी ? कौन  लड़ी ? क्यों लड़ी ?
मि – ये हिन्दुस्तानी जम्हूरियत का कोढ़  ! जंद्यौ लड़यूँ से बणद .
लाटो गळ्या (फोन पर )   - ओ ! एक मिनट हाँ . गुलाम जी गुलाम जी !
सुरजेझाला (फोन )  - जी क्या बताण .
मि –पीजा प्रेमी , लाटो रण दे . त्वे तै क्या तेरी ब्वे जी  तै बि क्या  पता कि जनेऊ क्या हूंद .
लाटो गळ्या  - नै नै स्वतंत्र गुलाम अंकल अर आनंदहीन शर्मा चाचान गूगल बिटेन खोजिक बतै छौ कि ...
मि – तो हे कम मगजी ! इथगा मा द्वी आपस मा लड़ण बिसे गे होला त तू कन्फ्यूज ह्वे गे ह्वेली.
लाटो गळ्या  - हाँ . हाँ . म्यार सब चमचा इनि करदन मि तै बथांद बथांद लड़न मिसे जान्दन अर मि क्या से क्या बुलण लग जान्द .
मि – अच्छा हे परिवारवादी राजनीति का दुखदायी नासूर ! इन त बथदि बल जनेऊ कन पैरे जान्द .
लाटो गळ्या  - कन ! कन पैरे जान्द ? मेकअप मैन जन पैरावो तन इ पैरे जान्द .
मि – हे बदबूदार गंदी राजनीति का शहजादा ! इन त बतादी बल जनेऊ पैरणो बाद का कुछ नियम धियम बि जदि कि  ना ?
लाटो गळ्या  - हाँ जगा जगा न्यूज कैमरा समिण जनेऊ दिखावो अर मोदी से तै सवाल पूछो अर मोदी तै गाळी द्यावो.
मि – हे डेमोक्रेसी का ब्लैक स्पौट ! मि चुनावी सभा की बात नि छौं करणु . जनेऊ पैरणो नियमुं बात करणु छौं .
लाटो गळ्या  - पर चकड़ेत कालू जाधव अर खुर्रांट अब्दुल्ला अंकलूंन यी बताई बल सब तै जनेऊ दिखाओ अर मोदी तै गाळी द्यावो.
मि – हे डेमोक्रेसी कु  खाज खुजली ! जनेऊ पैरणो असली उद्येस्य क्या हूंद ?
लाटो गळ्या  - ब्वाल च ना कि जनेऊ से हिन्दू आपीजमेंट का लाभ मिल्दो ,  हिन्दुओं तै खुश करणों बान जनेऊ एक हथियार च याने जनेऊ हिन्दुओं तैं मूर्ख बणानो एक अब्बल हथियार च .
मि –- हे भगवान ! ये हिन्दुस्तानौ क्या ह्वाल . एक राम तै हथियार बणान्द त हैंक जनेऊ तैं हथियार बणान्द.
7 /12 /2017,  Copyright@ : भीष्म कुकरेती

शहरी टिटहरी Red-wattled Lapwing, Shari tithri( Vanellus indicus)

गढ़वाल की चिड़ियायें - भाग -27

( Birds of  Garhwal; Birding and Birds of Garhwal, Uttarakhand, Himalaya ----- 27) 
-
आलेख : भीष्म कुकरेती , M.Sc.; D.M.S.M; D.E.I.M.
टिटहरी सवर्त्र पायी जाने वाला मानव वस्तियों  के  पास रगने वाला पक्षी है ।  इसकी लम्बाई 32 -35 सेंटीमीटर होती है शरीरी टिटहरी की काली टोपी , काली छाती , काली नोकदार लाल चोंच, पीली टांग वाले टिटहरी की आँख के सामने लाल बाली  (Wattle ) होती है।  इसी तरह पीली बाली वाला टिटहरी भी होता है।  टिटहरी की आवाज बड़ी कर्कश होती है इसीलिये गढ़वाल में इस पक्षी को 'कर्रें 'कहते है. 

-
सर्वाधिकार @सुरक्षित , लेखक व भौगोलिक अन्वेषक  



Birds of Pauri Garhwal, Birds of  block, Pauri Garhwal , Uttarakhand Himalaya; Birds of  Kot block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of  Kaljikhal block, Pauri Garhwal ; Birds of Dhangu (Dwarikhal)  block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of  Jahrikhal block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya  ;Birds of  Ekeshwar block, Pauri Garhwal ;  Birds of  Pauri block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of Pabau , Pabo  block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of Rikhanikhal  block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of  Bironkhal block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya  ; Birds of Yamkeshwar  block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of Naninidanda  block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of  Dugadda block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of  Pokhara block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of Khirsu  block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Bird watchers Guide Uttarakhand , Himalaya; Bird watchers Guide Garhwal, Uttarakhand , Himalaya ; Bird watching Places in Pauri Garhwal, Himalaya, Uttarakhand  , Birding  Garhwal, Uttarakhand Himalaya , Birding  Garhwal, Uttarakhand Himalaya ,Birding Dehradun garhwal, Birding Dehradun Shivalik, Himaalya 
गढ़वाल ,  चिड़ियाएं , उत्तराखंड , चिड़ियाएं , हिमालय  चिड़ियाएं , पौड़ी गढ़वाल चिड़ियाएं  , उत्तराखंड चिड़ियाएं  , हिमालय चिड़ियाएं , उत्तर भारतीय चिड़ियाएं , दक्षिण एशिया चिड़ियाएं

कबूतर , Rock Pigeon ( Columba livia)

गढ़वाल की चिड़ियायें - भाग -28

( Birds of  Garhwal; Birding and Birds of Garhwal, Uttarakhand, Himalaya ----- 28) 
-
आलेख : भीष्म कुकरेती , M.Sc.; D.M.S.M; D.E.I.M.

 33 सेंटीमीटर लम्बाई वाला रंग का कबूतर तकरीबन सब जगह पाया जाता है। कबूतर की पूंछ भी सिलेटी होता है और इसके पंखों व शरीर पर काले बैंड होते हैं।  बर्फीला कबूतर का सर काला व पूँछ पर सफेद बैंड होता है।  कबूतर मानव वस्तियों में पाया जाता है। 
-
सर्वाधिकार @सुरक्षित , लेखक व भौगोलिक अन्वेषक  



Birds of Pauri Garhwal, Birds of  block, Pauri Garhwal , Uttarakhand Himalaya; Birds of  Kot block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of  Kaljikhal block, Pauri Garhwal ; Birds of Dhangu (Dwarikhal)  block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of  Jahrikhal block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya  ;Birds of  Ekeshwar block, Pauri Garhwal ;  Birds of  Pauri block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of Pabau , Pabo  block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of Rikhanikhal  block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of  Bironkhal block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya  ; Birds of Yamkeshwar  block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of Naninidanda  block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of  Dugadda block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of  Pokhara block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of Khirsu  block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Bird watchers Guide Uttarakhand , Himalaya; Bird watchers Guide Garhwal, Uttarakhand , Himalaya ; Bird watching Places in Pauri Garhwal, Himalaya, Uttarakhand  , Birding  Garhwal, Uttarakhand Himalaya , Birding  Garhwal, Uttarakhand Himalaya ,Birding Dehradun garhwal, Birding Dehradun Shivalik, Himaalya 
गढ़वाल ,  चिड़ियाएं , उत्तराखंड , चिड़ियाएं , हिमालय  चिड़ियाएं , पौड़ी गढ़वाल चिड़ियाएं  , उत्तराखंड चिड़ियाएं  , हिमालय चिड़ियाएं , उत्तर भारतीय चिड़ियाएं , दक्षिण एशिया चिड़ियाएं

पाठ वाचन में ज्ञान स्तर का महत्व

Preparation for IAS Exam, UPSC exams 
-
पाठ वाचन में ज्ञान स्तर का महत्व 

-

गढवाल भ्रातृ मंडल (स्थापना -1928 ) , मुंबई  की मुहिम  –हर उत्तराखंडी  IAS बन सकता है )
-
IAS/IRS/IFS/IPS  कैसे बन सकते हैं श्रृंखला  -41
-
गढ़वाल भ्रातृ मण्डल हेतु प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती 
-
  सूचना ज्ञान प्राप्ति हेतु केवल रौ मटीरियल होते हैं।  रौ मटीरियल रुपया सूचनाओं को सही तरह से प्रयोग क्र ही ज्ञान प्राप्ति होता है।  ज्ञान याने जो मस्तिष्क के स्मरण ,  विश्लेषण , संश्लेषण वाले कोष्ट में बैठ जाय। ज्ञान तोता रटंत से प्राप्त नहीं होता है अपितु विषय को सांगोपांग रूप से समझने से  होता है।  सामान्य परीक्षाएं रटने या सूचनाओं से पास की जा सकती हैं किन्तु IAS की परीक्षाएं ज्ञान प्राप्ति से ही पास की जा सकती हैं।  कुंए के पाने का ऊपरी  तल यदि सूचना स्तर है तो ज्ञान ऊपरी  तल से नीचे गहरा तल है। ज्ञान स्मरणीय होता है और सूचनाएं गैर स्मरणीय। किन्तु बगैर सूचनाओं को संकलित किये ज्ञान नहीं आता है। 


-
शेष IAS/IPS/IFS/IRS कैसे बन सकते हैं श्रृंखला  में..... 
-
-
कृपया इस लेख व 
हर उत्तराखंडी IAS बन सकता है" 
आशय को   लोगों तक पँहुचाइये प्लीज ! 
-

IAS Exams, IAS Exam preparation, UPSC exams, How I can be IAS , Rules of IAS exams, Characteristics of IAS exam, How will I success IAS exam, 
S UPSC Exam Hard ?Family background and IAS/UPSC Exams, Planning IAS Exams, Long term Planning, Starting Age for IAS/UPSC exam preparation,  
Sitting on other exams ,
Should IAS Aspirant take other employment while preparing for exams?, Balancing with College  Study ,
Taking benefits from sitting on UPSC exams, Self Coaching IAS/UPSC Exams,  Syllabus  IAS/  UPSC Exams ,

मंगलेश जी ! डा. उनियाल जी ! सुनील नेगी जी ! जनता अब पत्रकारों और साहित्यकारों को दलाल समझती है !

विश्वसनीयता , भरोसा , ट्रस्ट कु ट्वाटा  

(Best  of  Garhwali  Humor , Wits Jokes , गढ़वाली हास्य , व्यंग्य )
-
 चबोड़ , चखन्यौ , ककड़ाट  :::   भीष्म कुकरेती    
-
 परिवारवादी राजनीति का प्रतीक कॉंग्रेसी महाराजा राहुल गांधी मोदी जी से पुछणा रौंदन बल मंहगाई मा अलण चीज नी मिलणी , फलण चीज नी मिलणी अर जडडू मा बद्रीनाथ मा सिपायुं तैं पीजा तो छवाड़ो ताजा ताजा नर्यूळ मिलण दुर्लभ ह्वे गे। पर मि तैं लगद भारत मा समस्या मंहगाई या ताजा ताजा पीजा कु नी च।  हिन्दुस्तान मा  सबसे बड़ी समस्या 'विश्वसनीयता ' कु हर्चन्त च। 
  आजादी बाद बि एक जमानो छौ जब हम अपण राजनीतिक नेताओं पर पूरो भरवस करदा छा।  हम भग्यान कॉंग्रेसी भक्त दर्शन जी , भग्यान जनसंघी ऋषिबललभ सुन्द्रियाल जी अर निर्दलीय भग्यान झब्बन लाल आर्य जी पर पूरो भर्वस करदा छा।  चुनावौ बगत ह्वेन या खाली समौ हो यी इन काम नि करदा छा जां से यूंकी विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लग जाओ।  
   अब त यी हाल छन बल हम स्याळ पर भर्वस कर लींदा पर अपण राजनीतिक नौनु पर रति भर भर्वस नि करदां।  हम हमेशा शंसय मा रौंदा बल हमर पोलिटिकल लौड़ हमकुण बुबा बुबा समझिक बुलणु च या गधा समझिक बाब बुलणु।  च आज चोर की नियत पर कै तै शक नि हूंद किन्तु हरेक नेता की नीयत  पर शक हूंद। 
    अबि सि हमर ब्याळै  प्रधान मंत्री अर भूतपूर्व उप राष्ट्रपति पाकिस्तानी अधिकार्युं तै चोरी छिपी मीलेन।  जब आजौ प्रधान मंत्रीन पोल ख्वाल त पैल त कॉंग्रेसन सफा प्रेस कॉनफेरेन्स मा बोलि दे कि नहीं क्वी नि मील।  पर फिर चार पांच दिन बाद स्वीकार कर याल।  अब इन मा बेईमान , भ्रष्ट मंत्र्युं लीडर ईमानदार नेता मनमोहन सिंह जी पर कनै भर्वस करण। 
   फिर प्रधान मंत्री पर बि भरवस कनै करण ? इन ह्वे सकद च  सरकारी अधिकार्युं जण्या बगैर भूतपूर्व उप राष्ट्रपति या भूतपूर्व प्रधान मंत्री पाकिस्तानी अधिकारिओं से मील सौक ह्वावन।  अर बजीरे आजम यीं खबर तै कै अखबारौ नाम से छा बताणा।  प्रधान मंत्री की विश्वसनीयता पर त अधिक प्रश्न चिन्ह लगद जी। 
    विश्वसनीयता कु प्रश्न केवल राजनीति मा इ नी च।  अपितु पत्रकारिता मा त भयंकर अविश्सनीयता का माहौल च। अजकाल जनता की नजर मा हरेक पत्रकार दलाल दिख्यांद , हरेक लेखक राजनैतिक पार्टी का खरीद्यूं गुलाम दिख्यांद , जनता तै लगणु च हरेक साहित्यकार कै ना कै राजनीतिक पार्टी कु चोबदार च , एजेंट च।  ह्वे सकद च म्यार बुलण पर श्री मंगलेश डबराल , डा राजेश्वर उनियाल या श्री सुनील नेगी चिढ़ जावन पर या हकीकत च कि अब सामान्य  नागरिक बि बुद्धिजीविओं , पत्रकारों और लेखकों तैं  भड़वा  (राजनैतिक दलाल ) पदवी दीण से नि घबरान्द किलैकि क्वी राज्यसभा की सीट का वास्ता भड़वागिरी करणु च , क्वी पत्रकारिता का नाम से दलाली (हरीश रावत कु स्टिंग ओप्रेसन उदाहरण ) करणु च त क्वी साहित्यिक अकादमी की कुर्सी वास्ता साहित्य रचणु च।  
  आज पत्रकार अर साहित्यकार से निष्पक्षता की उम्मीद नि करे जांद। अब तो भीष्म कुकरेती  से कॉंग्रेस जन  निष्पक्षता की उम्मीद नि करदो तो यू प्रश्न चिन्ह तो साहित्य जगत पर ही लगद कि ना ? 
  अर रूण या च कि भोळ स्थतिन और भी भयावह हूण. 
 -

12/12 / 2017, Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai India

*लेख की   घटनाएँ ,  स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में  कथाएँ , चरित्र , स्थान केवल हौंस , हौंसारथ , खिकताट , व्यंग्य रचने  हेतु उपयोग किये गए हैं।
-
    ----- आप  छन  सम्पन गढ़वाली ---- 
-
 Best of Garhwali Humor Literature in Garhwali Language , Jokes  ; Best of Himalayan Satire in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  Uttarakhand Wit in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  North Indian Spoof in Garhwali Language Literature ; Best of  Regional Language Lampoon in Garhwali Language  Literature , Jokes  ; Best of  Ridicule in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  Mockery in Garhwali Language Literature  , Jokes    ; Best of  Send-up in Garhwali Language Literature  ; Best of  Disdain in Garhwali Language Literature  , Jokes  ; Best of  Hilarity in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  Cheerfulness in Garhwali Language  Literature   ;  Best of Garhwali Humor in Garhwali Language Literature  from Pauri Garhwal , Jokes  ; Best of Himalayan Satire Literature in Garhwali Language from Rudraprayag Garhwal  ; Best of Uttarakhand Wit in Garhwali Language from Chamoli Garhwal  ; Best of North Indian Spoof in Garhwali Language from Tehri Garhwal  ; Best of Regional Language Lampoon in Garhwali Language from Uttarkashi Garhwal  ; Best of Ridicule in Garhwali Language from Bhabhar Garhwal   ;  Best of Mockery  in Garhwali Language from Lansdowne Garhwal  ; Best of Hilarity in Garhwali Language from Kotdwara Garhwal   ; Best of Cheerfulness in Garhwali Language from Haridwar    ;गढ़वाली हास्य -व्यंग्य ,  जसपुर से गढ़वाली हास्य व्यंग्य ; जसपुर से गढ़वाली हास्य व्यंग्य ; ढांगू से गढ़वाली हास्य व्यंग्य ; पौड़ी गढ़वाल से गढ़वाली हास्य व्यंग्य ;
Garhwali Vyangya, Jokes  ; Garhwali Hasya , Jokes ;  Garhwali skits , Jokes  ; Garhwali short Skits, Jokes , Garhwali Comedy Skits , Jokes , Humorous Skits in Garhwali , Jokes, Wit Garhwali Skits , Jokes

पाठ वाचन में आत्मसात या प्रज्ञा स्तर IAS series

Preparation for IAS Exam, UPSC exams 
-

पाठ वाचन में आत्मसात या प्रज्ञा स्तर 

-

गढवाल भ्रातृ मंडल (स्थापना -1928 ) , मुंबई  की मुहिम  –हर उत्तराखंडी  IAS बन सकता है --42)
-
IAS/IRS/IFS/IPS  कैसे बन सकते हैं श्रृंखला  -42
-
गढ़वाल भ्रातृ मण्डल हेतु प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती 
-
 वाचन में सर्व प्रथम सूचनाएं मन में जगह बनाती है।  यदि पाठक जिज्ञासु बन निम्न तरह से जिज्ञासु बन वाचन करता है तो वह  पाठ को कंठस्थ नहीं अपितु आत्मसात कार लेता है और जब जैसे आवश्यकता होती है वह उसे याद आ जाता है और आवश्यकतानुसार संश्लेषण -विश्लेषण वृति जागृत होकर वह  ततसंबंधी उत्तर भी खोज लेता है -
-
सत्य के प्रति जिज्ञासा - यहां पर समग्र वाचन से ही सत्य प्राप्ति होगा 
विषय के विशेष ज्ञान के प्रति जिज्ञासा 
मनन करना 
श्रद्धा से मनन करना 
निष्ठा से विषय के प्रति श्रद्धा रखना 
कार्य करना याने पढ़ते समय एकाग्रचित होना (वाह्य उत्तेजित करने वाले जैसे शराब , चरस , धूम्रपान आदि पदार्थों से दूर रहकर पढ़ना )
पढ़ते समय सुख की कामना में रहना 
विषय के मूल में जाना ही आत्मसात करना होता है 
-
 यह पाठ कुछ कुछ दार्शनिक है क्योंकि यह सिद्धांत छांदोगेय उपनिषद से लिया गया है जिसे आज के मनोवैज्ञानिक  अलग अलग  रुप से व्याख्या करते हैं 

-
शेष IAS/IPS/IFS/IRS कैसे बन सकते हैं श्रृंखला  43 में..... 
-
-
कृपया इस लेख व 
हर उत्तराखंडी IAS बन सकता है" 
आशय को   लोगों तक पँहुचाइये प्लीज ! 
-

IAS Exams, IAS Exam preparation, UPSC exams, How I can be IAS , Rules of IAS exams, Characteristics of IAS exam, How will I success IAS exam, 
S UPSC Exam Hard ?Family background and IAS/UPSC Exams, Planning IAS Exams, Long term Planning, Starting Age for IAS/UPSC exam preparation,  
Sitting on other exams ,
Should IAS Aspirant take other employment while preparing for exams?, Balancing with College  Study ,
Taking benefits from sitting on UPSC exams, Self Coaching IAS/UPSC Exams,  Syllabus  IAS/  UPSC Exams 

पाठ वाचन में आत्मसात या प्रज्ञा स्तर IAS series

Preparation for IAS Exam, UPSC exams 
-

पाठ वाचन में आत्मसात या प्रज्ञा स्तर 

-

गढवाल भ्रातृ मंडल (स्थापना -1928 ) , मुंबई  की मुहिम  –हर उत्तराखंडी  IAS बन सकता है --42)
-
IAS/IRS/IFS/IPS  कैसे बन सकते हैं श्रृंखला  -42
-
गढ़वाल भ्रातृ मण्डल हेतु प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती 
-
 वाचन में सर्व प्रथम सूचनाएं मन में जगह बनाती है।  यदि पाठक जिज्ञासु बन निम्न तरह से जिज्ञासु बन वाचन करता है तो वह  पाठ को कंठस्थ नहीं अपितु आत्मसात कार लेता है और जब जैसे आवश्यकता होती है वह उसे याद आ जाता है और आवश्यकतानुसार संश्लेषण -विश्लेषण वृति जागृत होकर वह  ततसंबंधी उत्तर भी खोज लेता है -
-
सत्य के प्रति जिज्ञासा - यहां पर समग्र वाचन से ही सत्य प्राप्ति होगा 
विषय के विशेष ज्ञान के प्रति जिज्ञासा 
मनन करना 
श्रद्धा से मनन करना 
निष्ठा से विषय के प्रति श्रद्धा रखना 
कार्य करना याने पढ़ते समय एकाग्रचित होना (वाह्य उत्तेजित करने वाले जैसे शराब , चरस , धूम्रपान आदि पदार्थों से दूर रहकर पढ़ना )
पढ़ते समय सुख की कामना में रहना 
विषय के मूल में जाना ही आत्मसात करना होता है 
-
 यह पाठ कुछ कुछ दार्शनिक है क्योंकि यह सिद्धांत छांदोगेय उपनिषद से लिया गया है जिसे आज के मनोवैज्ञानिक  अलग अलग  रुप से व्याख्या करते हैं 

-
शेष IAS/IPS/IFS/IRS कैसे बन सकते हैं श्रृंखला  43 में..... 
-
-
कृपया इस लेख व 
हर उत्तराखंडी IAS बन सकता है" 
आशय को   लोगों तक पँहुचाइये प्लीज ! 
-

IAS Exams, IAS Exam preparation, UPSC exams, How I can be IAS , Rules of IAS exams, Characteristics of IAS exam, How will I success IAS exam, 
S UPSC Exam Hard ?Family background and IAS/UPSC Exams, Planning IAS Exams, Long term Planning, Starting Age for IAS/UPSC exam preparation,  
Sitting on other exams ,
Should IAS Aspirant take other employment while preparing for exams?, Balancing with College  Study ,
Taking benefits from sitting on UPSC exams, Self Coaching IAS/UPSC Exams,  Syllabus  IAS/  UPSC Exams 

Why did Barsuri villagers stop getting Cooking Vessels

(Folk Tales from Garhwal for Management Training Series -132)
-
Collected and Edited by: Bhishma Kukreti (Management Trainer)
(Narrated by Mrs. Chandrakala Barthwal Kukreti from Barsuri)
-
       Barsuri is a village in Langur Patti, near Dwarikhal and Bhairongarh in Pauri Garhwal (Uttarakhand).
    In old age, there was always scarcity of metal vessels especially for big size cooking vessels for cooking food feast. Barsuri was lucky as Barsuri villagers used to get from Chakundi Udyar (Chakundi Cave). Chakundi Udyar is nearby Barsuri. In past the cave opening was wide but now, there is nominal opening
      It is said that a fairy living in Chakundi cave was very happy with Barsuri villagers. The Cave Fairy blessed the villagers. She was so pleased that whenever Barsuri villagers needed big vessels for cooking food for feast the Chakundi Udyar Pari (Fairy of Chakundi cave) offered them big vessels. Villagers used to call Pari for different vessels for feast and the Cave Fairy used to place the required vessels outside of the cave. After completion of feast, villager used to return back the vessels duly very cleaned. No villager used to return vessels without proper cleaning the vessels.
  One day, a villager needed vessels for his daughter marriage and he called Cave Fairy for vessels. However, Cave Fairy did not respond. He called many times for vessels but Udyar Pari (Cave Fairy) did not respond at all. The villager returned to village and took other villagers with him to the cave. They requested the fairy for vessels but the fairy did not respond. On the contrary, the Cave Fairy closed the cave opening. All villagers were shocked by closing the cave opening. All called the Fairy and asked for knowing her annoyance.
   The Udyar Pari (Cave Fairy) answered that last time, when another villager took vessels for marriage party, the villager returned a couple of vessels uncleaned and she stopped offering vessels to Barsuri villagers.
  The villagers asked Fairy for forgiving the villager but Udyar Fairy did not forgive and she stopping responding the villagers call from that moment. The Barsuri villagers took vow not to return vessels to the donor without proper cleaning. However, Udyar Pari did not melt by their vows.
   Still after centuries, Barsuri villagers curse that villager who returned uncleaned vessels to the Fairy.  
-
Copyright@ Bhishma Kukreti, Mumbai, 2017
 Why did Barsuri villager stop getting Cooking Vessels
-
(Folk Tales from Garhwal for Management Training Series -132)
-
Collected and Edited by: Bhishma Kukreti (Management Trainer)
(Narrated by Mrs. Chandrakala Barthwal Kukreti from Barsuri)
-
       Barsuri is a village in Langur Patti, near Dwarikhal and Bhairongarh in Pauri Garhwal (Uttarakhand).
    In old age, there was always scarcity of metal vessels especially for big size cooking vessels for cooking food feast. Barsuri was lucky as Barsuri villagers used to get from Chakundi Udyar (Chakundi Cave). Chakundi Udyar is nearby Barsuri. In past the cave opening was wide but now, there is nominal opening
      It is said that a fairy living in Chakundi cave was very happy with Barsuri villagers. The Cave Fairy blessed the villagers. She was so pleased that whenever Barsuri villagers needed big vessels for cooking food for feast the Chakundi Udyar Pari (Fairy of Chakundi cave) offered them big vessels. Villagers used to call Pari for different vessels for feast and the Cave Fairy used to place the required vessels outside of the cave. After completion of feast, villager used to return back the vessels duly very cleaned. No villager used to return vessels without proper cleaning the vessels.
  One day, a villager needed vessels for his daughter marriage and he called Cave Fairy for vessels. However, Cave Fairy did not respond. He called many times for vessels but Udyar Pari (Cave Fairy) did not respond at all. The villager returned to village and took other villagers with him to the cave. They requested the fairy for vessels but the fairy did not respond. On the contrary, the Cave Fairy closed the cave opening. All villagers were shocked by closing the cave opening. All called the Fairy and asked for knowing her annoyance.
   The Udyar Pari (Cave Fairy) answered that last time, when another villager took vessels for marriage party, the villager returned a couple of vessels uncleaned and she stopped offering vessels to Barsuri villagers.
  The villagers asked Fairy for forgiving the villager but Udyar Fairy did not forgive and she stopping responding the villagers call from that moment. The Barsuri villagers took vow not to return vessels to the donor without proper cleaning. However, Udyar Pari did not melt by their vows.
   Still after centuries, Barsuri villagers curse that villager who returned uncleaned vessels to the Fairy.  
-
Copyright@ Bhishma Kukreti, Mumbai, 2017

Himalayan Folk Stories for Management Training from Garhwal; Folk Stories for Management Training from Garhwal, Uttarakhand; Himalayan Folk Stories for Management Training from Garhwal, Central Himalaya; Himalayan Folk Stories for Management Training from Garhwal, North India; Himalayan Folk Stories for Management Training from Garhwal, India; Himalayan Folk Stories for Management Training from Garhwal, South Asia; Himalayan Folk Stories for Management Training from Garhwal, Asia

Calling Jwalaram Jakhmola Family of Jaspur as Saukar Family

(Folk Tales from Garhwal for Management Training Series -137)
(History Aspects of Jaspur series 44)
-
Collected and Edited by: Bhishma Kukreti (Management Trainer)
(Folk Story Narrated by late Shrimati Kwanradevi Shishram Kukreti from Jaspur)
-
           In Jaspur village (Dhangu, Pauri Garhwal, UK), there is locality called ‘Saukarun Khwal ’meaning houses of money lenders or rich men. Families of late Rewat Ram, Malukram  (sons of Jwalaram) and Govind Ram Jakhmola ( nephew of Jwalaram) lived at that locality (‘Saukarun Khwal’) before ten years. Originally, Jakhmola of Jaspur are from Mitragram (Dhangu).
 My grandmother (father’s aunt) told me story behind calling that Jakhmola family (Jwalaram and brothers) as ‘Sauka’r Family or money lender or rich family.
      Great grandfather of late Jwalaram was Dallaram. Dallaram was brother of Netru Jakhmola who migrated from Mitragram to Jaspur. Jwalaram and his brother were descendants of Dalla Ram Jakhmola.
     Balaram Jakhmola was forefather of Jwalaram (Name differs from real one). Balaram was very hard worker in the village. Balaram Jakhmola cleared forests of Mithal and other places and made the land suitable and fertile for agriculture land.
     Due to hard work of Balaram family, the family started producing highest grain quantity as finger millets other millets, barleys, Ogal ect. in the village. However, nobody called Balaram as ‘Saukar’ or rich man.
      The Khalihan (grain thrashing yard) of Balaram was at Sati Math of Jaspur. There, Balaram family used to thrash all types of grains. Thrashing in Garhwal is done by bulls walking on the ripped crops in the yard. Then the thrashed grains is sieved by big sieves (Matyanl).    
    The custom is that when a man is sieving grains he will not change his position even by an inch and will not come out of yard at all till the job is completed. Therefore, the person who sieves the thrashed grains should be strong that he doesn’t change position from the time he starts sieving till end.
       One year, there was good rain and timely rain and there was double the crops of finger millet for Balaram than past. Balaram family took three days for thrashing millet grains by making bulls walking on cut millets cubs. The raw thrashed grains were ready for sieving on his Khalyan (Khalihan). Balaram took big sieve (Matyanl) for sieving the dusty grains and his family members started putting dusty grains on big sieve. Balaram was sieving grains by Matyanl and family members were putting grains of Matyanl. The production was so much that slowly sieved grains covered Balaram by neck and then head of Balaram was covered by grains. Balaram did not leave sieving and though his head was covered by grains and his hands were up and Balaram was still sieving. After sometime, the sieving was completed and Balaram came out of grain piles. Villagers came to know that Balaram was covered by sieved grains.   Villagers called Balaram as ‘Kudya Saukar’(Rich by finger millet).
 Later on, the villagers stopped calling Balaram family as ‘Kudya Saukar’ but called only ‘Saukar. Still the villagers call family of late Jwalaram and his brothers as ‘Saukar’ family.                  
-
Copyright@ Bhishma Kukreti, Mumbai, 2017
Himalayan Folk Stories for Management Training from Garhwal; Folk Stories for Management Training from Garhwal, Uttarakhand; Himalayan Folk Stories for Management Training from Garhwal, Central Himalaya; Himalayan Folk Stories for Management Training from Garhwal, North India; Himalayan Folk Stories for Management Training from Garhwal, India; Himalayan Folk Stories for Management Training from Garhwal, South Asia; Himalayan Folk Stories for Management Training from Garhwal, Asia

In support of Jakhmola Migrating to Jaspur as Gharjavain

(Folk Tales from Garhwal for Management Training Series -136)
(History Aspects of Jaspur series 42)
-
Collected and Edited by: Bhishma Kukreti (Management Trainer)
(Folk Story Narrated by Shri Virendra Jakhmola from Jaspur)
-
  A couple of years back I informed my readers that a Jakhmola family from Mitragram migrated to Mitragram (Matargaon) as Gharjavain. Gharjavain means the father in law donating his land to his daughter and son in law in his native place and his son in law and daughter settling there. There were questions from certain sections for my saying that a Jakhmola family from Mitragram settled in Jaspur as Gharjavain.
 Before, Gurkha rule, Kukretis were staying in Jaspur and Gweel village (Malla Dhangu, Pauri Garhwal) was not established yet as separate village. Mitragram (Malla Dhangu) was part of Gatkot and was not a village yet. 
 This author wrote as per information from his grandmother Shrimati Kwanra Devi wife of Shri Shish Ram Kukreti (my father’s elder uncle). Shri Virendra Jakhmola told me stories for Jakhmolas settling in Jaspur.
      One of resident Netru Ji from Mitragram was married a Kukreti girl of Jaspur. The Kukreti girl was botherless. Her father or Netru Ji’s father in law offered Netru Ji to settle in Jaspur as Gharjavain. Netru Jakhmola settled in Jaspur with his brother Dulla Jakhmola around 1800. Virendra Jakhmola and me calculated as per date of birth of late Narayan Datt Jakhmola around 1880-1885. Late Narayan Datt Jakhmola was sixth generation in the family tree of Netru Jakhmola.
  After Netru Jakhmola and his younger brother Dulla in Jaspur, there had been disputes between newly arrived Jakhmola family and Kukreti families (kin of father in law of Netru Jakhmola). The kin of Father in law of Netru never accepted Netru Jakhmola and Dulla Jakhmola. This dispute remained for many generations. Descendants of Netru and Dulla were staying I the house (presently Jagdish Prasad Kukreti and brothers the son of late Radhakrishna Kukreti. Kukreti families (descendants of Kukreti family related to Netru’s father in law) forced Jakhmola family to vacate that house and settled elsewhere. Jakhmola family settled below that house (now, Jakhmola line of houses).
  Till that time, there was no paper work completed from Jakhmola family side for ownership of their occupied land in Jaspur with government. When Kukreti family forced Jakhmola family for vacating old house, Jakhmola family completed the paper work of their occupied land with Patwari and Padahn.    
  
-
Copyright@ Bhishma Kukreti, Mumbai, 2017
Himalayan Folk Stories for Management Training from Garhwal; Folk Stories for Management Training from Garhwal, Uttarakhand; Himalayan Folk Stories for Management Training from Garhwal, Central Himalaya; Himalayan Folk Stories for Management Training from Garhwal, North India; Himalayan Folk Stories for Management Training from Garhwal, India; Himalayan Folk Stories for Management Training from Garhwal, South Asia; Himalayan Folk Stories for Management Training from Garhwal, Asia