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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Monday, March 3, 2014

प्रधान जी विज्ञापन नि दींदा त पता इ नि चलदो हमर गां मा इतगा उन्नति ह्वे

 चुनगेर ,चबोड़्या -चखन्यौर्या -भीष्म कुकरेती        

(s =आधी अ  = अ , क , का , की ,  आदि )
                     प्रधान जीक हम अहसानबंद छंवां। अनावश्यक रूप से हम पिछ्ला पांच साल से हीन भावना ग्रसित ह्वेक , मुक लुकैक जीणा छया। यूं पांच सालों मा हमर आस पड़ोस का गाँव वाळ जब बि विकास की छ्वीं लगांद छा त हम या त गरीब बच्चा जु  अमीर तैं चॉकलेट खांद देखींक  मन मारिक अपण मुख इना उना करि लींद ऊनि हम बि चुप चाप विकास इतिहास सुणदा छा या विकास का विषयुं तैं मोड़िक टीवी सीरीयलुँ या फिल्मुं पर बहस शुरू करै  दींद छा।  यदि यां पर बि पड़ोसी गाँव का रिस्तेदार अपण गांक विकास की बात पर ही अड़ी जा त हम बुल्दा छा कि हमर प्रदेस मा उर्दू भाषा , पंजाबी भासा , नेपाली भाषा का संस्थान छन तो गढ़वाळी भाषा संस्थान किलै नी च ? इख पर हमर कछेड़ि मा दुफाड़ ह्वे जांद छा जौंक गां मा विकास हुयुं दिख्यांद छौ उ बुल्दा छा आर्थिक विकास हूण द्यावो भाषा विकास अफिक ह्वे जाल त हम जन अविकसित गांका निवासी अड़ जांद छा कि जब तलक गढ़वाली भाषा कु विकास नि होलु तब तलक कै बि विकास तैं सर्वमान्य विकास नि मने जालु।  मतलब यु छौ कछेड्युं मा ग्राम विकास की बात पर  हम    बहस पसंद नि करदा छा।  दुसर गांका वुद्धिजीवी अखबारूं मा अमेरिकी कैपिटलिज्म अर जापानीज कैपिटलिज्म पर कोटद्वार , ऋषिकेश ,  पौड़ी का अखबारूं मा लेख छपांदा  छा त मै  सरीखा अविकसित गांवक वुद्धिजीवी मार्क्सवाद का फायदा पर अखबारूं कुण लेख भिजदा छा त अखबार मा लेख छपद ही नि छौ अर जब अखबारूं संपादकुं से लेख नि छ्पणो कारण पुछ्द छा तो संपादक बतांदा छा बल अब जब चीन या क्यूबा जन देस मा बि कार्ल्स मार्क्स का बारा मा लिख्यांण बंद ह्वे गे तो फिर गढ़वाल संबंधी अखबारूं मा कार्ल्स मार्क्स की क्या वैल्यू ? अब हम संपादकुं तैं क्या बतौन्दा कि चांद त हम बि कैपिटलिज्म ही छंवां  किन्तु जब गाँमा विकास नि ह्वावो तो कै मुखन हम कैपिटलिज्म का गुणगान करद ?  जब क्वी हैंक विकसित गां वाळ  गाँमा सीमेंट सड़क की बात कारो त हम बुल्दा छा सीमेंट की सड़क मा हिटण  से पैरों मा तिड़वाळ पोड़ जांद अर गार माटो रस्ता से शरीर हृष्ट -पुस्ट रौंद।  कै गाँमा सोलर ऊर्जा से उज्यळ हूंद त हम अविकसित गाँ वाळ  उखाक लोगुं तैं डरांदा छा कि सोलर ऊर्जा विकिरण से कैंसर हूंद।  
                यूं पिछ्ला पांच सालों मा हमर गां वाळ हीं भावना ग्रसित ह्वे गे छ्या कि हमर गां मा विकास नि हूणु च।  
            वु  त जब उत्तराखंड मा पंचायत चुनाव आणो खबर सूणिक हमर ग्राम प्रधानन दिल्ली , लखनऊ , कलकत्ता अर मुम्बई का अखबारूं मा विज्ञापन अर भेंटवार्ता छपवाइन अर फेसबुक मा बि अपण मंतव्य बताइ तब जैक हम तैं पता चौल कि हमर गाँमा सैकड़ों योजना पूरी ह्वेन अर हमर गां तैं विकास कार्यों वास्ता राज्य सरकार , केंद्रीय सरकार ही ना अंतररास्ट्रीय संस्थानुं से योग्य्ता सर्टिफिकेट मिल्यां छन। 
           मुम्बई का अखबारूं से हम पौड़ी गढ़वाल का एक गाँव वाळु तैं पता चौल कि जै रस्ता तैं हम गार -माटौ रस्ता माणदा छा वू वास्तव मा खड़िन्जा छन अर यी खडिंजा आयातित खडिंजा छन।  अब तक हम अपण गाँ मा अपण रिस्तेदार मेहमानो तैं शरम का मारा अपण गां नि बुलांदा छा।  यदि हम तैं पता चलद कि हमर गां मा आयातित खड़िन्जौं से सड़क बणी च त किलै हम बगैर मेहमानो दिन बितान्दा ? खैर अब मुम्बई का अखबारूं मा ग्राम सभा का विज्ञापनो से हम तैं पता चल गे कि हमर गां मा बि आधुनिक सड़क बणि गे तो हम अब अपण मेहमानु तैं बुलौला अर मुम्बई का अखबारूं कटिंग दिखौला कि ल्या द्याखो तुमर गां मा इंडियन सीमेंट से सड़क  बण पर हमर गां मा त इम्पोर्टेड खड़िन्जाओं से फस्क्लास रोड बणी।  या गर्व की बात हम तैं पैल पता हूंद तो हम हीं भावना ग्रसित किलै हूंद ?
           इनी हम गलत फहमी मा छया कि हमर गाँमा सिंचाई साधन नि छन तो हमर गांवाल देहरादून -भाभर पलायन करण लगी गे छा।  कलकत्ता का एक अखबार मा हमर ग्राम सभा का नव निर्माण शीर्षक विज्ञापन से हम तैं पता चौल कि पिछ्ला पांच सालुं मा हमर दस रगडुं माँ दस हौज बणिन।  हम गाँव वाळु की ही गलती छे कि हम भूलि गे छा कि यी रगड़ हमर गां की हद मा छन अर यूं रगडुं मा खेती बि ह्वे सकद।  हम त पचास सालुं से इन समजणा छया कि यी रगड़  राज्य सरकार की जमीन मा छन। खैर अब हम लोग खेती करणो अवश्य ही सुचला। 
                 लखनऊ का अखबारूं मा हमर ग्राम सभा का कनेक्टिविटी प्रोग्राम विज्ञापन से हम तैं पता चौल कि हमर गां मा कथगा ही पुळ बणिन।  अर पुळ बि इन डांडों मा  बणिन जख शायद घ्वीड़ -काखड़ ही जांदा होला।  चूँकि हमर गाँकि महिला अर मरद अब डांड नि जांदन त हम तैं पता ही नि चौल कि अब हमारा वास्ता ग्राम प्रधान जीन इथगा सुविधा जुटै आलिन।  
              इनी दिल्ली का अखबारूं से पता चौल कि हमर गां मा कथगा ही बाल कल्याण अर महिला कल्याण की योजना चलणी छन अर हम वांक फायदा ही नि उठै सकवां।
             खैर धीरे धीरे सबि विज्ञापनो से हम तैं पता चल गे कि हमर गां मा व्यापक विकास ह्वे अर सैकड़ों विकास की योजनाओं पर काम हूणु च।  अब हम गां वाळु की हींन  भावना ख़तम ह्वे गे अर अब हम ग्राम सभा द्वारा प्रकाशित विज्ञापन लेक दुसर गाँव वळु तैं चिरड़ाण मिसे गेवां कि द्याखो हमर गां मा कथगा विकास ह्वे गे। हम ग्राम प्रधान का आभारी छंवां जौन विज्ञापन से हमार आँख खोलिन अर बताइ कि हमर गां कथगा विकसित ह्वे गे ; विज्ञापनो से ही हम तैं पता चौल कि हमर गां उन्नति का पथ पर चलणु च।  थैंक यू !  ग्राम प्रधान जी ! 
              सुणन मा आयि कि आस पास का ग्राम प्रधान बि मुम्बई , दिल्ली , लखनऊ , कलकत्ता का अखबारूं विज्ञापन दीण वाळ छन।  
 


Copyright@ Bhishma Kukreti  2  /3/2014 


*कथा , स्थान व नाम काल्पनिक हैं।  
[गढ़वाली हास्य -व्यंग्य, सौज सौज मा मजाक  से, हौंस,चबोड़,चखन्यौ, सौज सौज मा गंभीर चर्चा ,छ्वीं;- जसपुर निवासी  द्वारा  जाती असहिष्णुता सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ढांगू वालेद्वारा   पृथक वादी  मानसिकता सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;गंगासलाण  वाले द्वारा   भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; लैंसडाउन तहसील वाले द्वारा   धर्म सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;पौड़ी गढ़वाल वाले द्वारा  वर्ग संघर्ष सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; उत्तराखंडी  द्वारा  पर्यावरण संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;मध्य हिमालयी लेखक द्वारा  विकास संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;उत्तरभारतीय लेखक द्वारा  पलायन सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; मुंबई प्रवासी लेखक द्वारा  सांस्कृतिक विषयों पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; महाराष्ट्रीय प्रवासी लेखकद्वारा  सरकारी प्रशासन संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; भारतीय लेखक द्वारा  राजनीति विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; सांस्कृतिक मुल्य ह्रास पर व्यंग्य , गरीबी समस्या पर व्यंग्य, आम आदमी की परेशानी विषय के व्यंग्य, जातीय  भेदभाव विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; एशियाई लेखक द्वारा सामाजिक  बिडम्बनाओं, पर्यावरण विषयों   पर  गढ़वाली हास्य व्यंग्य, राजनीति में परिवार वाद -वंशवाद   पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ग्रामीण सिंचाई   विषयक  गढ़वाली हास्य व्यंग्य, विज्ञान की अवहेलना संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य  ; ढोंगी धर्म निरपरेक्ष राजनेताओं पर आक्षेप , व्यंग्य , अन्धविश्वास  पर चोट करते गढ़वाली हास्य व्यंग्य    श्रृंखला जारी  

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