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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Thursday, August 1, 2013

उपभोग्या वस्तु अर कलायुक्त वस्तु

[गढ़वाली हास्य -व्यंग्य, सौज सौज मा मजाक मसखरी  दृष्टि से, हौंस,चबोड़,चखन्यौ, सौज सौज मा गंभीर चर्चा ,छ्वीं;- जसपुर निवासी  के  जाती असहिष्णुता सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ढांगू वाले के  पृथकवादी मानसिकता सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;गंगासलाण  वाले के  भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; लैंसडाउन तहसील वाले के  धर्म सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;पौड़ी गढ़वाल वाले के वर्ग संघर्ष सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; उत्तराखंडी  के पर्यावरण संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;मध्य हिमालयी लेखक के विकास संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;उत्तरभारतीय लेखक के पलायन सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; मुंबई प्रवासी लेखक के सांस्कृतिक विषयों पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; महाराष्ट्रीय प्रवासी लेखक का सरकारी प्रशासन संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; भारतीय लेखक के राजनीति विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; एशियाई लेखक द्वारा सामाजिक  बिडम्बनाओं पर   गढ़वाली हास्य व्यंग्य श्रृंखला ]


                          
चबोड़्या -चखन्योर्या -भीष्म कुकरेती 



 भौत सा लोग मि तैं पुछदन बल कंज्युमरेबल अर आर्टफुल मा क्या भेद च , फरक  च, अंतर च तो मि कथगा हि उदाहरण दींदु। 
अब जन कि ब्वे जब तलक काम करणि रावो , तुमर बच्चों गू मूत पुंजणि रावो तो ब्वे उपभोग्या वस्तु च अर जैदिन ब्वेक हथ-खुट बैठि जावन वैदिन बिटेन ब्वै कलायुक्त वस्तु ह्वे जान्दि। कलायुक्त वस्तु उपभोगो काम नि आन्दि अर उपभोग्या  आर्टफुल नि होंद। कला प्रदर्शन का वास्ता ही ठीक रौंद I 
कुछ साल पैल अर कुछ जगा आज बि घ्वाड़ा   कंज्युमरेबल कोमेडिटि छे आज घ्वाड़ा मुंबई -दिल्ली मा केवल कला युक्त जिन्दो जानवर च I 
बग्घी -तांगा एक समौ पर उपयोगी वस्तु छ्या अब केवल कला प्रदर्शन का वास्ता ही बग्घी -तांगा छन I 
पैल  काठौ या पथरौ पयळ (गहरी थाली ) रोजमर्रा कामै चीज छया अब तो पयळ पुरात्व विभाग का  सैंकणो  चीज ह्वेगेन I 
बंसथ्वळ , नरयुळ , बैठ्वा हुक्का, चिलम , अग्यलु , कुट्युं तमाखु कबी उपयोगी या उपभोक्ता वस्तुओं श्रेणी मा आंद छा अज यी सब वस्तु कला मा शामिल ह्वे गेन I 
महात्मा गांधी एक उपयोगी सिद्धांत छौ अब महात्मा गांधी एक कलायुक्त सिद्धांत च I 
टुपला या पगड़ी एक उपयोगी अर घमंड को माध्यम छौ अब नाटकों मा कला का बान टुपला या पगड़ी उपयोग होंद I  
कला वै बात या चीज वस्तु होंद जो रोजमर्रा की बात नि हो I ब्वे बाबुं,  बड़ों, ग्यान्युं  तैं आदर दीण रोजमर्रा क बात छे आज कै तैं  बगैर स्वार्थौ आदर सत्कार दीण त अब नाटकों मा बि  दिखणो नि  मिलद अब बड़ों तैं आदर दीणौ बात इतिहासौ किताबों मा हि मिलद किलैकि आदर दीण अब कला ह्वे गे I 
घट अर घटम पिसण एक रोजमर्रा काम छौ अब घट आर्टफुल इमारतों मा बि नि गणे जंद बलकणम  आर्कियोलौजिकल सर्वे का मिल्कीयत मने जांदन I 
पैल झंग्वर -बाड़ी -चुनै रुटि खाण रोजमर्रा बात छे अर ग्युं रुटि अर चौंळ कबि कबार त्यौहारूं मा खये जांद छौ  I अब ग्युं -चौंळ आम खाद्य वस्तु ह्वे गेन क्वाद - झंग्वर आर्टफुल फार्मिंग ह्वे गे I 
बुळख्या -पाटी -रिंगाळै कलम प्राइमरी स्कूलम पढ़णौ  एक रोजमर्रा कु  माध्यम छौ अब बुळख्या -पाटी -रिंगाळै कलम "वन्स अपौन अ टाइम " की बात ह्वे गेन अर जो बि चीज "वन्स अपौन अ टाइम " माँ शामिल ह्वे जावो समझि ल्यावो या चीज कला मा शामिल ह्वे गे I 
इमानदार , कर्तव्यनिष्ठ , जन सेवक राजनेता हूण आम बात छे अब इमानदार , कर्तव्यनिष्ठ , जन सेवक राजनेता हूण "वन्स अपौन अ टाइम " की बात च याने  इमानदार , कर्तव्यनिष्ठ , जन सेवक राजनेता दिख्याण इनि च जन अजकाल कै पंचतारा होटलम पथरौ पयळुम खाणों खाण I द्वी चीज दुर्लभ ह्वे गेन I  उन जन कि टेलीग्राम आज प्रागैतिहासिक काल की बात च अर अब म्यूजियम मा टेलीग्राम का अवशेष धर्यां छन ऊनि  इमानदार , कर्तव्यनिष्ठ , जन सेवक राजनेता अब आर्कियोलौजिकल म्यूजियम का दीवारों मा ही मिलदन I   
 राजाओं बगत पर गढ़वाली अर कुमाउंनी भाषा मा शासनादेस दीण कलायुक्त बात छे , आम बात नी छे I आज बि प्रशासन का वास्ता गढ़वाली अर कुमाउंनी भाषा  दुर्लभ भाषा छन I 
ब्यौ शाद्युं मा मांगळ गाण आम बात छे अब मांगळ केवल केसेटों मा मिलद किलैकि मांगळ कला मा जि शामिल ह्वे गेन I 
पैल सेन्स ऑफ ह्यूमर रोजमर्रा बात छे आज सेन्स ऑफ ह्यूमर नोन्सेन्स ह्वे ग्याइ याने आज सेन्स ऑफ ह्यूमर कला ह्वे ग्याइ I 
जरा बथावदी म्यरो इ लेख रोजमर्रा को लेख च या कलापूर्ण लेख च ? 

Copyright @ Bhishma Kukreti  2/8/2013  

 
[गढ़वाली हास्य -व्यंग्य, सौज सौज मा मजाक मसखरी  दृष्टि से, हौंस,चबोड़,चखन्यौ, सौज सौज मा गंभीर चर्चा ,छ्वीं;- जसपुर निवासी  के  जाती असहिष्णुता सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ढांगू वाले के  पृथक वादी  मानसिकता सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;गंगासलाण  वाले के  भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; लैंसडाउन तहसील वाले के  धर्म सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;पौड़ी गढ़वाल वाले के वर्ग संघर्ष सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; उत्तराखंडी  के पर्यावरण संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;मध्य हिमालयी लेखक के विकास संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;उत्तरभारतीय लेखक के पलायन सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; मुंबई प्रवासी लेखक के सांस्कृतिक विषयों पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; महाराष्ट्रीय प्रवासी लेखक का सरकारी प्रशासन संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; भारतीय लेखक के राजनीति विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; एशियाई लेखक द्वारा सामाजिक  बिडम्बनाओं पर   गढ़वाली हास्य व्यंग्य श्रृंखला जारी ...]  

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