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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Monday, June 15, 2009

दिनमानी कू ब्यौ"

वक़्त बदली मन भी, बदलिगी सब्बि धाणी,
प्यारा पहाड़ मा अब, दिन-दिन बारात जाणी,
सोचा हे सब्बि, किलै यनु ह्वै.......

ये जमाना मा ब्योलि कू बुबाजी,
डरदु छ मन मा भारी,
दिनमानी की बारात ल्ह्यावा,
समधी जी कृपा होलि तुमारी,
किलैकी अज्ग्याल का बाराती,
अनुशासनहीन होन्दा छन....

एक जगा गै थै, ब्याखुनी की बारात,
दरोळा रंगमता पौणौन, मचाई उत्पात,
फिर त क्या थौ,
खूब मचि मारपीट,
चलिन धुन्गा डौळा,
अर् कूड़ै की पठाळि,
ब्यौली का बुबान,
झट्ट उठाई थमाळि,
काटी द्यौलु आज सब्ब्यौं
बणिगी विकराल,
घराती बारातियों का ह्वैन,
बुरा हाल.

घ्याळु मचि, रोवा पिट्टी,
सब्बि बब्रैन,
चक्क्ड़ीत बराती, फट्ट भागिगैन,
बुढया खाड्या शरीफ पौणौ की,
लोळि फूटिगैन,
हराम ह्वैगि पौणख,
सब्बि भूका रैन,
वे दिन बिटि प्रसिद्ध ह्वै ,
"दिनमानी कू ब्यौ",

(अपने पहाड़ के श्री परासर गौड़ साहिब जी चिरपरिचित कवि, लेखक एवं फिल्मकार
ने भी एक बारात में मारपीट का अनुभव अपनी रचना में व्यक्त किया है
)

जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिग्यांसू"
स्वरचित(११.९.२००९)
(सर्वाधिकार सुरक्षित, प्रकाश हेतु अनुमति लेना अनिवार्य है)
ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी-चन्द्रबदनी, टेहरी गढ़वाल(उत्तराखण्ड)